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एक बात बताओ

एक बात करनी है तुमसे, आओ, बैठो

कुछ सवाल हैं बस, मन हल्का करना है समझ लो


परसों जब वो मोहल्ले में सब्ज़ी बेचने आया

तुमने उसका नाम पूछ कर उसे मार भगाया

उसकी हरी सब्ज़ियों से ज़्यादा हरा, तुम्हें उसकी शक़्ल में दिखा


फिर सफूरा जब अपने नाम, अपने घर के लिए लड़ी

तो उसकी बोली, उसकी आवाज़ उसके लहजे में - तुम्हें उसके हक़ की लड़ाई नहीं,

हरा हिजाब दिखा


एक बात बताओ,

तुम हरे से इतना चिढ़ते क्यों हो?

उसके पैदा होते ही, तुमने उसे नाज़ुक बताया

फिर उसके वजूद की क़ीमत, उसका दायरा समझाया

एक क़दम तुमसे आगे बढ़ी और तुम तैश में आ गए?


एक बात बताओ

तुम गुलाबी से इतना जलते क्यों हो?


शक़्ल ख़ूबसूरत चाहिए और गोरी भी, कोई बात नहीं, अपनी अपनी पसंद है

लेकिन उनका रंग गहरा होने पर, वो तुमसे कम कैसे हो गए?

क्रीम, कभी उबटन का नुस्ख़ा देते हो, सूरत से सीरत परखते हो


एक बात बताओ

गोरे पर फ़क़्र करते हो, करो…मगर सांवले से इतना खिजते क्यों हो?


उनके बोलने, उनके चलने से परेशान हो

उनके पहनावे, उनकी पसंद से हैरान हो

आसमाँ में दिखता है, तो ख़ुश होते हो, तस्वीर भी लेते हो


एक बात बताओ

अपने आसपास दिखने वाले इंद्रधनुष पर इतना ग़ुस्सा क्यों करते हो?


यह ग़ुस्सा, चिढ़न, जलन सिर्फ़ ज़िद है या घबरा जाते हो?

एक बात बताओ

इन रंगों के उड़ने, महकने, चमकने से, तुम इतना ख़ौफ़ क्यों खाते हो?

आँचल

जुलाई, २०२०

बॉम्बे




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